कितना कुछ कहना चाहा
मन की बातें मन में रह गई।
विरह वेदना से घायल हो,
स्मृति से आँखें भर गई।
घंटों बैठी रही कागज लिए
लिखने को कुछ अपना
अन्त में अश्रुजल की स्याही गिर गई।
लाख मनाया दिल को ऐसे वैसे
हालत मन की कैसे कैसे
शब्दों की आपस में सुलह हो ही गई।
उदगारों से भर गया आंचल
दिल में कितनी हलचल हलचल
सम्भावनाओं की अठखेलियाँ होती चली गई
श्रृगार के नये संदर्भ खोज डाले
मन में कितने अरमां पाले
झुकी जरा-सी डाल तो कलियाँ झर गई। क्र
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