Tuesday, January 27, 2009

मन की बातें

कितना कुछ कहना चाहा
मन की बातें मन में रह गई।
विरह वेदना से घायल हो,
स्मृति से आँखें भर गई।
घंटों बैठी रही कागज लिए
लिखने को कुछ अपना
अन्त में अश्रुजल की स्याही गिर गई।
लाख मनाया दिल को ऐसे वैसे
हालत मन की कैसे कैसे
शब्दों की आपस में सुलह हो ही गई।
उदगारों से भर गया आंचल
दिल में कितनी हलचल हलचल
सम्भावनाओं की अठखेलियाँ होती चली गई
श्रृगार के नये संदर्भ खोज डाले
मन में कितने अरमां पाले
झुकी जरा-सी डाल तो कलियाँ झर गई। क्र

Monday, January 26, 2009

आनन फानन

हिरनी सी ये मस्त पवन
डोल रही अम्बर तल
कल-कल करते निर्मल झरने
शोभित होते अति सुंदर
नील गगन में उडते पक्षी
करते वातावरण गुंजित
मनोभाव हैं सतत संजोए
सावन की रितु के अन-तल
मोर मयूर सुशोभित करते
वन-उपवन के आंगन
झूम उठा है सवि तेरा मन
इस रितु के आनन-फानन।

धानी धानी धरती

आकाश का टुकड़ा
उतर रहा धरती पर
धीरे-धीरे
भू-मंडल की मस्त चहक
कूके जैसे कोयल
नीले अम्बर में तारों सी
चुनरी ओढ़े दुल्हन
नख शिख है सुर शोभित
कानन हरीयल मोती
धरती की हरियाली सी
पहने गोरी चूडियन
धानी-धानी लहंगा पहने
धरा ताक रही है
आकाश को तमन्ना से
फिर से।